_जप मंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है?_

 _जप मंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है?_ 



उत्तर : श्रीकृष्ण गीता में यह कहते है कि मंत्रों में जप मंत्र मेरा ही स्वरूप है। जप का अर्थ है नित्य अपने अंतर में किसी एक विशेष संकल्प को दोहराना की जब तक वह संकल्प पूर्ण न हो जाय। और मंत्र यानी क्या? मंत्र यानी उस जप पर अपने मन को एकाग्र करना।

          जो भी शब्द,भाव,संकल्प,क्रिया आप के मन को एकाग्र करे और आप के संकल्प का भाव दृढ़ करे वह मंत्र है।

     चाणक्यने अखण्ड भारत का संकल्प लिया था, तो उन्होंने अपने पूरे अस्तित्व से इस संकल्प को पूरा करने में प्राण अर्पण किये इसी लिए उन्होंने अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त किया। 

            मीरा का कृष्ण के प्रति पति जैसा संकल्प था और वह जप मंत्र उसके अंतर में एकाग्र हो कर उसके अस्तित्व का अंग बन गया। फिर एक से एक पद,भजन और सांखी का निर्माण हुआ।


 _" *लोग अक्सर पूछते है कि जप करते वक्त ध्यान बहुत भटकता है, इसका उपाय क्या है?"_ 

तो उसका जवाब यह है कि कोई भी संकल्प या भाव यदि आप के जीवन में सब से महत्वपूर्ण है, और आप के अस्तित्व का अदम्य हिस्सा ही हो तो वह मंत्र जरूर सिद्ध होगा। कोई साधना या उपासना की आवश्यकता क्या है?

गांधी, सरदार, सिंधु ताई सपकाल, बाबा रामदेव , नरेंद्र मोदी से लेकर हर कोई जो महान हुआ है उनके जीवन में एक संकल्प और एक मंत्र का योगदान है।

मुश्किल आती है, संघर्ष आते है, जिस समाज के लिए वह सब कुछ करना चाहते है, वही समाज उन्हें काटने को दौड़ता है। पर फिर भी उनका अस्तित्व ही उनका दृढ़ संकल्प बन कर सिद्ध होता है।

आदि कवि वाल्मीकि, तुलसीदास, नरसिंह मेहता,तुकाराम, साईं बाबा के संकल्प में और पूरे अस्तित्व में ईश्वर समर्पण था, इसी कारण मौलिक रचनाएं और विविध प्रकार के व्याख्यान उनके मन से निकलते थे।


अगर आप रोज १००० बार विष्णु सहस्त्रनाम करते हो परन्तु आप के संकल्प रूपी मन के अस्तित्व में यदि विष्णु दृढ़ नहीं है तो वह आप के लिए मुक्ति का द्वार नहीं है। 

           जैन धर्म में मानने वाले लोग नित्य प्रतिक्रमण और सामायिक करते है परन्तु यदि अहिंसा और क्षमा रूपी जप मंत्र अस्तित्व का हिस्सा नहीं है तो नवकार कभी फलीभूत नहीं होगा। लोग 

               ५० साल तक नित्य कर्मकांड और बाह्य उपचारों में लगे रहते है परन्तु मन का संकल्प उतना दृढ़ नहीं हो पाता, फिर परमात्मा का अनुभव नहीं हो पाता।

       आप का मन जिस संकल्प में दृढ़ हो उसी को मंत्र बना ले। वहीं आपकी सफलता का मंत्र होगा, खुद का मंत्र ही सफलता देगा।

अगर ३१४ बार " श्री राम जय राम जय जय राम " का नित्य जाप करेंगे परन्तु मन के संकल्प में राम की जय नहीं, पूरे आयुष्य यह करते रहने से तृप्ति न मिलेगी।

    हम लोग आज कल सफलता और महानता का मार्ग ढूंढते है , परन्तु हमारे संकल्प भी लोभ और भय से उक्त रहते है। याद रखे, जो संकल्प अस्तित्व को प्रसन्नता,प्रेम,शांति और कर्मठता की प्रेरणा करते है और सब के लिए भलाई का भाव रखते है। वहीं जप मंत्र बन कर सिद्ध होते है।

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