Geeta Darshan in hindi
गीता दर्शन ---------- ज्ञान और कर्म क्या है? योग क्या है? -------------------------------- इस जीवन की सभी घटनाएं, भाव, विचार, शब्द ,शरीर , और संबंधों से जुड़ा हुआ मोह सर्वथा नहीं रहेगा, यह अनित्य है, और नश्वर है, इसी को भली भांति जानना ज्ञान है। व्यक्ति एक निश्चित समय के लिए जन्म लेता है, और अपना समय पूर्ण होने पर वह मृत्यु को प्राप्त होता है, तो मृत्यु और मृत्यु तुल्य दु:खो के भय, राग और द्वेष से मुक्त और शोक रहित होना *ज्ञान* है। *कर्म* वह है, जो व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बीच में उसके अपने समय काल में अपनी प्रकृति के द्वारा निर्धारित गुणों से युक्त हो कर करता है, कर्म उसके निर्वाह के लिए आवश्यक है। इसी लिए श्रीकृष्ण कर्म को आवश्यक बताते है। हमारी ५ इंद्रिय विविध प्रकार के विरोधाभासी भावों को भोगती है। इसी से सुख -दुख,लाभ - हानि, जय - पराजय जैसे भाव प्रथम इंद्रिय को और उसी से अंतर को प्रभावित करते है। इसी प्रभाव से काम,क्रोध,मोह,लोभ, मद,मत्सर,ममत्व उत्पन्न होते है, और यह विविध प्रकार के...