मन क्या है?
मन क्या है? मन को उपनिषदों में ब्रम्ह का वह रूप कहा गया है,जो इंद्रियों से जुड़ा हुआ है, जो निरंतर वातावरण ,शिक्षा,समाज ,न्याय -अन्याय ,दुनिया के समस्त विरोधाभास और इंद्रियों के स्मृतिगत अनुभवों को ग्रहण करता है। मन को देखा नहीं जा सकता। मन का व्याप मस्तिष्क से लेकर नाभि तक है, यह मनुष्य के व्यहवार जगत ,भाव जगत और कर्म जगत को समेट कर चलता है। कल्पना,शब्द, एकाग्रता,चित्र, आवाज, आंखों देखी घटना,श्रद्धा,अंधश्रद्धा या कुछ भी ऐसा जो इंद्रियों को प्रभावित करता है,वह मन को भी छूता है। वास्तविक जीवन इसी क्षण में है। परन्तु मन के पास जाने अनजाने अनुभवों का इतना बोझ है,की आप न चाहते हुए भी भूतकाल और भविष्यकाल में मन से ही चले जाते हो। स्मृति अगल है, स्मृति कभी एक हद से ज्यादा बोझ नहीं रखती वह कुछ चीजें भूल जाती है, परन्तु मन सारे पुराने, नए अनुभवों को इंद्रियों के कंपनों के साथ ग्रहण करता है। मान लीजिए किसी एक दुकान के गरम गरम पकौड़े आपको पसंद है, अब वह दुकान बंद हो चुकी है, परन्तु उस विस्तार मे...