मन क्या है?
मन क्या है?
मन को उपनिषदों में ब्रम्ह का वह रूप कहा गया है,जो इंद्रियों से जुड़ा हुआ है, जो निरंतर वातावरण ,शिक्षा,समाज ,न्याय -अन्याय ,दुनिया के समस्त विरोधाभास और इंद्रियों के स्मृतिगत अनुभवों को ग्रहण करता है। मन को देखा नहीं जा सकता।
मन का व्याप मस्तिष्क से लेकर नाभि तक है, यह मनुष्य के व्यहवार जगत ,भाव जगत और कर्म जगत को समेट कर चलता है।
कल्पना,शब्द, एकाग्रता,चित्र, आवाज, आंखों देखी घटना,श्रद्धा,अंधश्रद्धा या कुछ भी ऐसा जो इंद्रियों को प्रभावित करता है,वह मन को भी छूता है।
वास्तविक जीवन इसी क्षण में है। परन्तु मन के पास जाने अनजाने अनुभवों का इतना बोझ है,की आप न चाहते हुए भी भूतकाल और भविष्यकाल में मन से ही चले जाते हो।
स्मृति अगल है, स्मृति कभी एक हद से ज्यादा बोझ नहीं रखती वह कुछ चीजें भूल जाती है, परन्तु मन सारे पुराने, नए अनुभवों को इंद्रियों के कंपनों के साथ ग्रहण करता है।
मान लीजिए किसी एक दुकान के गरम गरम पकौड़े आपको पसंद है, अब वह दुकान बंद हो चुकी है, परन्तु उस विस्तार में जाते ही आपको पकौड़े का स्वाद पकड़ता है, वह दुकान याद आती है,
देखिए , वर्तमान में वह दुकान बंद है, आपकी स्मृति भी यह जानती है, फिर भी आपको स्वाद दिलाने वाला आपका मन है।
आप अगर कुत्ते से डरते हो, तो यह भय आपके कुत्तों के साथ जुड़े अनुभवों का कंपन है, जो बार बार आपको कुत्तों से सावधान करता है। और आप हर कुत्ते से दूर भागते हो।
मन को स्मृति, बुद्धि,इंद्रियों और वाणी से भी अधिक बलवान माना गया है, मन इन सभी के कंपनों का एक डेटा बैंक है।
कभी कभी ऐसे अनुभव जो आपने वास्तविकता में न ग्रहण किए हो, परन्तु सिर्फ उसके बारे में सुना हो, तो भी आपको उसके कंपन महसूस होते है, मन वास्तविकता और वर्तमान का मोहताज नहीं है, वह कल्पना , शब्द,संगीत या चित्रों से भी कंपन ग्रहण कर सकता है, जो अंधश्रद्धा से ग्रसित है, उसका मन उसे आत्मा,भूत,प्रेत ,पिशाच का भी कंपन दे सकता है, मन वातावरण से भी कंपन ग्रहण करता है, किसी वीरान जगह पर जाने मात्र से आपका मन आपको वास्तविकता से बिल्कुल विपरीत कल्पना से जन्मे अनुभव दे सकता है, यदि आपको ईश्वर पर श्रद्धा है तो आपका मन आपको स्वप्न और खुली आंखों से भी ईश्वर से संबंधित अनुभव दे सकता है, वह जो कंपन आपको देता है, आपको भविष्य की झलक भी दिखा सकता है, यह भी अनुभव दे सकता है कि आप ईश्वर को पूर्ण रूप से प्राप्त हो चुके हो।
भावनाओं के प्रति मन सब से ज्यादा संवेदनशील है, वह आपको उन्माद, निराशा, या सर्वश्रेष्ठ होने का भरम भी दे सकता है, मन के लिए बर्बादी और आबादी दोनों एक है, वह कभी भेद नहीं करता, विरोधाभास उसके लिए एक सिक्के के दो पहलू है। दैवीय कृपा और घृणित पशुता दोनों उसके लिए खेल मात्र है। आपको संत बनाकर भी किसी का बलात्कार करवाना मन के लिए आसान है, यदि मन ऐसे कम्पनों से भरा हो।
कुदरत आपको इंसान के रूप में जन्म देती है, परन्तु यदि आप मन के गुलाम हो तो वह आपको सिर्फ एक पात्र बना देगा।
पात्र के पास दो ही विकल्प है, एक वह व्यहवार जगत की प्रतिक्रियाओं के भरम में उलझे, जो मस्तिष्क से नियंत्रित होता है, या फिर वह कर्म जगत को प्राप्त होकर एक सुलझा हुआ महान पात्र बने जो नाभि से नियंत्रित होता है। भाव जगत एक ऐसा जगत है जो हृदय से नियंत्रित होता है, वह व्यहवार और कर्म जगत दोनों के लिए कार्य करता है। मन के लिए भविष्य और कल्पना को साकार रूप देना भी संभव है।
प्राचीन ग्रंथों में मन की गुलामी करना पतन माना गया है, मन की रचना होना ही पतन है, मन से मुक्त होने के लिए या मन को अपना गुलाम बनाने के बहुत तरीके खोजे गए है।
संकल्प, इच्छाशक्ति,योग, ध्यान, प्राणायाम, यह सब मन को नियंत्रित करने के माध्यम है, परन्तु यह भरम है क्योंकि यदि आपने संकल्प लेने के लिए शब्दों का प्रयोग किया, ध्यान के लिए कल्पना का प्रयोग किया या किसी मूर्ति, नाद, मंत्र का प्रयोग किया ,ध्यान करने या प्राणायाम करने के लिए सांस पर एकाग्रता बनाए रखी , तो मन आपके इन संकल्पों को समझ कर उसके हिसाब से अपने भरम रचेगा, और थोड़े बहुत अभ्यास के बाद आपको लगेगा कि आपको परम शांति मिल रही है, एकाग्रता या फोकस बढ़ रहा है, पर वह भी मन का ही विषय है।
यदि आप श्रीकृष्ण में मन को एकाग्र करते हो तो आपको चमत्कार के, या समाधि के अनुभव होंगे, किसी को रास लीला दिखेगी, किसी को मुरली सुनाई देगी, किसी को चक्र दिखाई देगा, और आपको लगेगा कि आप मन के पार चले गए। शब्दों से किया गया ध्यान शब्द को ही प्राप्त होगा।
यदि आपने जिब्रीश शब्द का प्रयोग किया तो वह भी शब्द ही तो है, शब्द मन का विषय है, विषय का उपभोग कर के विषय को ही प्राप्त होना है।
श्वास पर किया गया ध्यान आपको एकाग्र कर देगा, नासिका के मध्य ध्यान करना भी आपको केवल अनुभव देगा कि आप वर्तमान में हो, और जैसे ही यह अनुभव हुआ, उसके कंपन आपका मन ग्रहण के लेगा, और फिर आप उसके गुलाम होंगे।
मन आपको नए बोध, समर्पण भाव और स्वीकार की भ्रांतियां देकर आपको आध्यात्मिक गुरु या चिंतक बना देगा, और फिर ठीक आपको उसके भी विरोधाभास का सामना करना पड़ेगा ,जैसे आध्यात्म की ऊंचाई को प्राप्त हो कर भी ओशो को जेल जाना पड़ा, और जहर पिलाया गया। मन ने ओशो को भगवान होने का भरम पहना दिया। विश्वरूप दिखाने वाले कृष्ण भी शापित हो कर सामान्य मानव की तरह मृत्यु को प्राप्त हुए।
मन से बने विश्व को नाटक के रूप में उसके ही साधनों से जान लेना और खुद को इस महान नाटक के खेल का पात्र जानना ही पर्याप्त है। इसी को आप मुक्ति भी कह सकते हो। पर सिर्फ कहने के लिए।

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