जीवन को देखने की तीन दृष्टि।

 जीवन को देखने की तीन दृष्टि।

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(१) *मनुष्य सामाजिक है।* : यह दृष्टि मनुष्य को समाज की शिक्षा, धर्म, ज्ञाती,उच्च - निच,परंपरा, रूढ़ि वाद, अच्छा बुरा, लोभ, प्रभाव ,अधिकार से जोड़ती है। यह दृष्टि के अनुसार समाज में प्रभाव, धन या आप की प्रतिष्ठा आप की सफलता का मापदंड है, और इसी माप दंड के आधार पर दुनिया आप का मूल्यांकन करती है। और इसी से आप की पहचान बनती है।


(२) *मनुष्य आयुष्य का एक निश्चित समय* है। - यह दृष्टि सामाजिक दृष्टिकोण से व्यापक है। जन्म और मृत्यु के बीच का समय ही जीवन है , तो मनुष्य एक आयुष्य की संभावना है, वह उसकी जाति, धर्म, शिक्षा और अधिकार से बहुत ऊपर है, और इस दृष्टि के आधार पर उसका मूल्यांकन उसके आयुष्य से प्राप्त समय का उसने किस तरीके से प्रयोग किया है उस पर है, उसका समय कैसे व्यतीत होता है इस पर उसके जीवन की गुणवत्ता है। वह चाहे तो किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है। जितना प्रसन्न रहेगा, उसका समय उतना ही गुणवत्ता युक्त रहेगा।


(३) *मनुष्य जीवसृष्टि की असीम संभावनाओं में से एक संभावना है।* -

 यह एक बहुत व्यापक दृष्टि है, इस ब्रह्मांड में करोड़ो साल पहले जीवन की संभावना का उद्भव हुआ। आज हम उसी जीवन की संभावनाओं को मंगल और चंद्र पर ढूंढ रहे है। उसी जीवन की संभावनाओं से अमीबा से ले कर बैक्टीरिया और वायरस तक का जन्म हुआ। मनुष्य भी इस जीवन या जीवसृष्टि की एक संभावना ही तो है। मतलब मनुष्य सिर्फ सामाजिक और आयुष्य का एक छोटा सा भाग न हो कर उसी जीवन की संभावना या जीवसृष्टि का *_विस्तरण_* है।

                                इस दृष्टिकोण से मनुष्य , पशु पक्षी,कीटक और पतंगा सब एक ही *जीवन शृंखला* के अंश है और जीवन के उस प्रवाह का जतन कर रहे है जो करोड़ों वर्षों से अस्तित्व में है , जिसके कारण ब्रह्मांड का जन्म हुआ था। इसी जीव सृष्टि के अंश को ब्रम्ह कहा गया है, जो सभी में एक समान रूप से विद्यमान है। 

            जब यह एहसास हो जाता है तो जीवन - जीवन में भेद का नाश होता है। फिर मनुष्य सिर्फ आयुष्य यानी जन्म और मृत्यु नहीं रहता क्योंकि जब तक जीवन है उसे ज्ञात है कि जन्म और मृत्यु के चक्र की संभावना चलती रहेगी। जो इस जीवन की संभावना में स्थित हो जाता है वह विश्वरूप हो जाता है।



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