Geeta Darshan in hindi
गीता दर्शन
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ज्ञान और कर्म क्या है? योग क्या है?
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इस जीवन की सभी घटनाएं, भाव, विचार, शब्द ,शरीर , और संबंधों से जुड़ा हुआ मोह सर्वथा नहीं रहेगा, यह अनित्य है, और नश्वर है, इसी को भली भांति जानना ज्ञान है।
व्यक्ति एक निश्चित समय के लिए जन्म लेता है, और अपना समय पूर्ण होने पर वह मृत्यु को प्राप्त होता है, तो मृत्यु और मृत्यु तुल्य दु:खो के भय, राग और द्वेष से मुक्त और शोक रहित होना *ज्ञान* है।
*कर्म* वह है, जो व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बीच में उसके अपने समय काल में अपनी प्रकृति के द्वारा निर्धारित गुणों से युक्त हो कर करता है, कर्म उसके निर्वाह के लिए आवश्यक है। इसी लिए श्रीकृष्ण कर्म को आवश्यक बताते है।
हमारी ५ इंद्रिय विविध प्रकार के विरोधाभासी भावों को भोगती है। इसी से सुख -दुख,लाभ - हानि, जय - पराजय जैसे भाव प्रथम इंद्रिय को और उसी से अंतर को प्रभावित करते है। इसी प्रभाव से काम,क्रोध,मोह,लोभ, मद,मत्सर,ममत्व उत्पन्न होते है, और यह विविध प्रकार के राग (Attachments) और द्वेष (hatered) को जन्म देते है।
तो हमारी आंख,कान,नाक,जिह्वा और स्पर्श से संबंधित सभी प्रकार के विषयों से राग द्वेष सहजरूप से जन्म लेते है।
यदि यह विरोधाभास और राग द्वेष के होते हुए भी हमारा अंतर इससे उत्पन्न सुख और दुख से अप्रभावित रहे , एवं निरंतर शांत ,संतुष्ट रहे तो इसी स्थिति को *समत्व* कहा गया है। और *समत्व* ही *योग* है।
ज्ञान वस्तु ,व्यक्ति,शब्द,भाव और घटनाक्रम के अनित्य और परिवर्तनशील होने पर जोर देता है, और योग बाह्य रूप से विरोधाभासों को सहन करते हुए भी अंतर की शांति और स्थिरता पर जोर देता है, तो यदि कोई व्यक्ति जो ज्ञान योग में निष्ठा रखता है, वह संसार और उपलब्ध भोगों को परिवर्तनशील और अनित्य जानकर उससे उत्पन्न राग और द्वेष को अपने अंतर से अप्रभावित रखता है, उसे ज्ञान है कि सुख भी चला जाएगा, दुख भी, व्यक्ति भी चला जाएगा और वस्तु भी। तो ज्ञान योग रूपी बुद्धि से वह नित्य विरोधाभास को भोगता हुआ भी शांत संतुष्ट और प्रसन्न रहता है।
कर्म योग में निष्ठा रखने वाला जानता है, की मै जन्म और मृत्यु के बीच के समय में अपनी प्रकृति से प्रेरित कर्म करने हेतु बाध्य हूं। और यही मेरा अधिकार है, तो वह कर्म करना ही अपना अधिकार समझ कर, कर्म से उत्पन्न होने वाले राग द्वेष से मुक्त रहता है,
इसी इंद्रिय के विषय और विविध प्रकार के कर्मों से उत्पन्न विरोधाभास एवं राग द्वेष को श्रीकृष्ण *कर्मफल* कहते है, और वह कहते है कि "कर्मों के फल पर तेरा अधिकार नहीं।"
उदाहरण : यदि एक सुपर स्पेशियलिस्ट हार्ट सर्जन अपनी ही मां या बेटी के दिल का ऑपरेशन करता है, और उस प्रकिया में उसके शरीर की शस्त्र क्रिया करता है, तो उसे हिंसा का दोष नहीं लगता, इसी प्रकार कोई सैनिक या योद्धा भयानक युद्ध में कितने भी दुश्मनों को गोली मारे ,उसे हत्या का दोष नहीं लगता।
तो श्रीकृष्ण इसी को ही *स्वधर्म* कहते है, *स्वधर्म* को जानना ही ज्ञान योग और कर्म योग को जोड़ता है। जो संसार को अनित्य जानकर अपने कर्म रूपी स्वधर्म का पालन करता है, एवं स्वधर्म का पालन करते हुए राग और द्वेष से उत्पन्न *कर्मफल* से अप्रभावित रहता है,तो वह सभी प्रकार के दोष से मुक्त रहता है।श्रीकृष्ण कहते है, प्राणी मात्र कर्म करने हेतु बाध्य है, इसी लिए अपने स्वधर्म का पालन करने हेतु उस दिशा में कर्म करना , कर्म न करने से या अपने स्वधर्म को छोड़ किसी दूसरे के स्वधर्म का पालन करने से श्रेष्ठ है।
श्रीकृष्ण कहते है,की अपने स्वधर्म अनुसार किया गया यज्ञ,दान और तप सात्विक कर्म है, तथा स्वधर्म के पालन हेतु जो निश्चित अनिवार्य कर्म है वह भी सात्विक कर्म है।
उदाहरण :
यज्ञ:अर्जुन एक क्षत्रिय कुल में जन्मा राजकुमार है, तो उसके लिए युद्ध करना और धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र उठाना यज्ञ है,।
दान : किसी को सुरक्षा का वचन देना और उसकी निस्वार्थ सुरक्षा करना दान है।
तप :अपने धर्म के निर्वाह के लिए विविध प्रकार के अस्त्र और शस्त्र प्राप्त करना और शिक्षा ग्रहण करना तप है।
इसी तरह यदि आप शिक्षक है; तो
यज्ञ: अपने पास आए विद्यार्थियों को श्रेष्ठ ज्ञान देना यज्ञ है।
दान : समाज के कमजोर और उपेक्षित लोगों की बिना किसी स्वार्थ के सहाय करना और उन्हें भी शिक्षा का अधिकार देना दान है।
तप : अपने शिक्षक रूपी स्वधर्म का पालन करने के लिए और यज्ञ एवं दान हेतु खुद भली भांति क्षमतावान और शिक्षित होना और निरंतर अभ्यास करना तप है।
इसी प्रकार स्वधर्म के पालन हेतु कर्म सात्विक कर्म है,
जो व्यक्ति यज्ञ ,दान तप और नियत कार्यों को छोड़ कर अन्य किसी भी प्रकार का कर्म करता है, वह राजसी कर्म है। अभिमान एवं किसी भी प्रकार के लोभ से प्रेरित होकर कर्म करता है, वह राजसी कर्म है।
और जो कर्म करने में प्रमाद करता है, अपने कर्तव्य का पालन करने से भागता है, वह मोह और प्रमाद से उत्पन्न हुआ तामसी कर्म है।
श्रीकृष्ण कहते है, की कर्म मात्र का चयन मनुष्य के प्रकृति दत्त गुण और समाज के कर्म विभाग के अनुसार होता है, प्रत्येक मनुष्य का अपना तप,दान और यज्ञ प्रकृति और समाज निर्धारित करता है। इसी लिए " में कर्ता हूं, या मैने ही यह कर्म किया", "में ही कर सकता हूं।", या " में ही सर्वश्रेष्ठ हूं, ऐसा अहंकार पालना मनुष्य को अपनी सहजता से विचलित करता है। यह अहम कर्मयोग से विचलित करने वाला और द्वंद्वों के चक्र में बांधने वाला है।
इसी लिए कर्ताभाव से मुक्त होकर स्वधर्म का पालन करना श्रेष्ठ है ।
श्रीकृष्ण ने ज्ञान और कर्म योग के माध्यम से संसार की अनित्यता को जानकर अपने स्वधर्म के अनुसार कर्म करने को कहा है और कर्म करते हुए राग द्वेष और ममत्व से उत्पन्न कर्मफल को सहन करने एवं भीतर से शांत और संतुष्ट रहने का मार्ग बताया है। अब यह प्रश्न होता है कि व्यक्ति आज के समय में स्वधर्म को कैसे निर्धारित करे? क्योंकि पूर्व काल में स्वधर्म त्रिगुणों यानी कि सत्व, राजस और तमस और ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र जैसे कर्म विभाग पर आधारित था। मोटे तौर पर हर एक व्यक्ति का स्वधर्म निश्चित था। परन्तु इस प्रणाली में अब परिवर्तन हुआ है। तो यह स्वधर्म निर्धारित करने के लिए विद्वानों ने २ प्रश्न पर चिंतन करने को कहा है।
(१)अगर आपके पास कोई वित्तीय बाधाएं नहीं होती, तो आप "काम के लिए ही कौन सी गतिविधि करते?
(२)वह कौन सा कर्म है जो करते समय आप समय का पता भूल जाते हैं?
यह दो प्रश्न पर चिंतन करे क्योंकि इसका उत्तर ही आपका स्वधर्म है। यह अक्सर आपके प्रकृति या स्वभाव का संकेत होता है। इस प्रकृति के अनुसार किया गया कर्म, यज्ञ, तप और दान सदैव विरोधाभासों के होते हुए भी व्यक्ति को अंदर से शांत और संतुष्ट रखता है। ज्ञान योग का मार्ग अष्टावक्र के द्वारा जनक को मिला था। जिसका सार अष्टावक्र गीता के रूप में उपलब्ध है। और कर्मयोग का मार्ग प्रकृति द्वारा सब जीवों को पहले से ही प्राप्त है। केवल मनुष्य इसे भूल गया है। और श्रीकृष्ण ने स्वयं सूर्य को इस योग का अधिष्ठाता बताया है।
श्रीकृष्ण ने आगे एक और मार्ग भी कहा है जिसमें ध्यान और भक्ति के द्वारा परमात्मा की विभूति अथवा निष्ठापूर्वक परब्रह्म पुरुषोत्तम को राग द्वेष से जन्मे सारे विरोधाभास रूपी कर्म फल और कर्म को अर्पण करने का मार्ग है।
ध्यान योग और भक्ति योग इस अनित्य संसार को छोड़ कर नित्य शाश्वत परब्रह्म को मन, वचन और कर्म से समर्पित होने की बात करता है।
अगर ध्यान और भक्तियोग से आप राग द्वेष तथा ममत्व से मुक्त हो कर स्वयं को परब्रम्ह में पा कर शांत और संतुष्ट हो सकते हो , तो यह मार्ग भी आप के लिए है। यह मार्ग आपको कर्म से विचलित नहीं करता पर यह भाव आपमें दृढ़ करता है कि समस्त संसार उसके अनित्य और परिवर्तनशील संयोग, कर्म एवं कर्मों का फल यह सब कुछ परब्रह्म में उसी तरह समाहित है जैसे नदिया समुद्र में समाहित है। यह एक आस्तिक मार्ग है,
परन्तु काल वश यह मार्ग भ्रष्ट हो चुका है, रूढ़िवादी और वर्णव्यवस्था वादी धार्मिक पंडितों, ब्राह्मणों
संतो और भक्ति कवियों ने केवल परब्रह्म की भक्ति, नाम स्मरण, भजन और कीर्तन को ही अपना नित्य कर्म बनाकर समत्व से स्वधर्म का मार्ग मनुष्य समाज को भुला दिया। और कथा, कीर्तन ,स्थूल कर्मकांडो से तथा भगवद नाम स्मरण से ही मनुष्य परब्रह्म में स्थित हो सकता है ऐसा समझाया, इसके लिए विविध आचार और नियम निश्चित किये गए और इसी से बहुत सारे अलग अलग संप्रदाय का जन्म हुआ, जिन संप्रदायों ने मनुष्य को मूर्ति, पुस्तक, यज्ञ , मंत्र, तंत्र ,निर्गुण और सगुण भेद एवं अलग अलग प्रकार के समाज और निष्ठाएं दी। जिसने आज दमन ,शोषण , वैमनस्य और वैचारिक तथा चरित्र के विकृत पतन को जन्म दिया है। आज धार्मिक कहे जाने वाला व्यक्ति दुःख और विचारों की दरिद्रता से त्रस्त है, मानसिक रूप से भ्रमित और संताप से परिपूर्ण है। मंदिर में रोज जाकर भी उसे शांति नहीं। तथा कथित आध्यात्मिक गुरु और संतों ने ध्यान और प्राणायाम को भी सगुण और निर्गुण रंग दे दिया है। श्रीकृष्ण द्वारा जिस मार्ग की सबसे अधिक बात की गई थी वह मार्ग उन्हीं के नाम से आज आपने भ्रष्ट स्वरूप को प्राप्त हुआ है। यह दु:खद बात है।श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है " मुझ परब्रह्म में निष्ठा रखने वाला यह भली भांति जानता है कि मैं उसमें हूँ और वह मुझमें है"। यह जानकर यदि तू योद्धा है तो तू युद्ध कर, युद्ध के परिणाम से जन्मा शोक और हानि भी मुझमें है, और युद्ध के बाद मिलने वाला राज्य और भविष्य भी मेरे अंदर ही समाहित है। जो भी तुझे पहले,आज या बाद में प्राप्त होगा ,या जो भी तुने पहले, आज और बाद में खोया , स्वयं तू और तेरे सभी प्रकार के कर्म अपने सभी फलों के सहित तू अपने आप को मुझ परब्रह्म में विद्यमान देख। ऐसा जानकर भी तू शोक मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त होगा"।*
अब यह बात विश्वरूप दर्शन योग का सार है।
पंडितों ने इसको भ्रष्ट किया है, वह कहते है कि रोज परमात्मा के नाम और मंत्र का जप करो, रोज पारायण करो। इससे रोज आपको यह याद रहेगा कि परमात्मा इस जगत का स्वामी है और इसी से आपकी भक्ति दृढ़ होगी ।
"श्रीकृष्ण कहते है कि सब कुछ मुझ ही में विद्यमान जानकर यदि तू योद्धा है तो युद्ध कर, यदि चिकित्सक है तो लोगों को रोगमुक्त कर, यदि शिक्षक है तो अच्छे से अच्छा पाठ सिखा। यही सच्ची निष्ठा है। श्रीकृष्ण आपको समत्व और स्वधर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं करते। श्रीकृष्ण कहते है कि इस प्रकार जो भी आपने संसार को मुझमे विद्यमान देखता है वह संसार भोगते हुए भी सन्यासी है, ऐसे भक्त का प्रत्येक कर्म स्वयं परब्रह्म ही है। इसी को कृष्ण ने मोक्ष संन्यास कहा है।

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